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श्याम

देख चित्र तुम्हारा मोहन राधा नैन मेघ श्याम छाए ।। होवे बरखा रिमझिम रिमझिम, भीगी ना राधा भीगा श्याम जाए ।। भोर भई लूं मन अपना जग से जोड़, क्या करूं उस क्षण रे कान्हा, जब शाम हो रंजित श्याम आए।। विरह छाए घनघोर घने नृत्य करे अश्रुमोर, जो रूठी राधा रणछोड़ से, फिर राधा मनाने श्याम आए ।। देखा स्वप्न सहसा बंध रही बंधन की डोर, सुलादो सैकड़ों सदियां, टूट स्वप्न न श्याम जाए ।। तेरा जाना सांवरे मन निधिवन गया उजाड़, खिले पुष्प अब तब ही, जब भंवरा श्याम आए ।। तुझे ढूंढने को घूम दिए मंदिर कंदरा पहाड़, जो खोजा आप में, दर्श देने को श्याम आए ।।

सामाजिक समरसता: भाषण नहीं भंडारा

Disclaimer: जो कोई भी आपसे यह कहता है कि वह आपको किसी समूह में जोड़ कर, किसी पार्टी में जोड़कर या किसी तथाकथित आंदोलन में जोड़कर समाज से आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक भेदभाव को समाप्त कर देगा तो व्यक्ति आपको केवल और केवल अपने हितों को आप के जरिए साध रहा है । समाज में भेदभाव मिटाना और समरसता लाने के लिए किसी भाषण की, किसी नेता की कोई जरूरत नहीं है जरूरत है सिर्फ और सिर्फ भंडारों की और आपकी उसमें सहभागिता की । हाल ही में हमने निर्जला एकादशी का त्यौहार मनाया या जिसे हम बचपन से ही छबील वाला दिन मनाते आ रहे हैं, CORONA संकट की इस घड़ी में सब बन्द था पर यदि नहीं होता तो आपको देखने को मिलती पानी की छबीलें और कुछ जगह पर लंगर और भंडारे भी । पर बतौर समाज हमें इन छबीलों, लंगरों और भंडारों आवश्यकता सिर्फ इसलिए नहीं है क्योंकि इससे केवल किसी भूखे प्यासे का पेट भरेगा। यह छबीलें, लंगर और भंडारे समाजिक संरचना को मजबूत करने और आपस के भेद मिटाने में बहुत सहायक होते हैं। ऐसी मान्यता है यदि आपको अपने परिवार को इक्कठा रखना है तो उन्हें साथ में भोजन करने की आदत डालें और यदि आपको समाज को संगठित करना...

भारत: नशा और अध्यात्म

Disclaimer: मेरा किसी भी प्रकार के नशे से तो वैसे कोई दूर-दूर तक का लेना देना नहीं है और ना ही मैं किसी प्रकार का नशा करता हूं, पर मुझे नशे करने वाले व्यक्तियों से भी किसी तरह की आपत्ति नहीं है जब तक वह मेरी अपनी निजता का हनन न करें । किस्सा:  अभी हाल ही में मुझे एक पहाड़ी क्षेत्र में विचरण करने का मौका मिला। जब मैं अपने मित्र के यहां पहुंचा तो वहां कुछ बुजुर्ग लोग बैठकर हुक्का पी रहे थे। तभी एक बुजुर्ग आदमी ने मुझसे भी पूछा: बेटा हुक्का पियोगे ? मैंने फट से जवाब दिया: मैं नहीं पीता जी। तो फिर बुजुर्ग आदमी ने जवाब देते हुए कहा: पी लो बेटा बीड़ी से अच्छा होता है । मेरे मन में एक विचार शून्य अथवा अंधकार की भांति प्रवाहित हुआ और विचार आया कि मुझे एक लेखक होने नाते इस संदर्भ में कुछ लिखना चाहिए ताकि स्थिति थोड़ी स्पष्ट हो सके इसलिए  यह लेख लिख रहा हूं ताकि एक सामंजस्य स्थापित कर पाऊं नशा करने वालों में और न करने वालों में । आज के सामाजिक परिदृश्य में भारत मुझे एक झूले के भांति अनुभूति देता है, जो झूल रहा है नशा करने वालों और न करन...

Savvy's Savvy

Hidden pearls to express, Ire, aching, annoying, irritation and stress, keep as tranquil as Matterhorn**, Deep-down as a new child born, And the unhelpful me, Angling remedies in google’ sea, The perfect “Sanjeevani”, May be banana or honey, Agonizing to see you tussling, Keep moving keep hustling, The delight of motherhood, And the worth that only you have understood, O Captain! of maternity, The spring of upspring even after eternity, You are the real shero***, Without a regalia in shiro****, Mother Nature is your synonym, Both delivers, nurtures and are incarnated for that jum*****, But if one’s potency is adored why another’s is taboo, If one gets cheers why another one gets boo, But remember one’s savvy is incongruent without other’s, Halt your prejudice after all they both are mothers. ** Matterhorn= A mountain in Switzerland who recently displayed Indian flag *** Shero= representing she as a hero **** Shiro = white ( japan...

शादी: महिला अत्याचार की सच्ची कहानी।

  Disclaimer: मेरा लेख का किसी धर्म , जाति और संप्रदाय से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि जिसको भी या जिस भी धर्म , जाति और संप्रदाय को जब भी मौका मिला है उसने महिलाओं के शोषण की कोई कसर नहीं छोड़ी है। क्यों और कैसे वह आप आगे स्वयं पढ़ेंगे भी और जानेंगे भी वैसे यदि कोई उदाहरण याद आया हो तो पास रखना और कोशिश करना कि आप कभी भी किसी स्त्री पर उसे व्यवहारिक रूप से सजीव न करें। पर हां इस लेख का संबंध हर एक जीवित और मृत व्याहता से है जिसने एक दो या जितनी भी बार व्याह किया हो ( आख़िर उसकी मर्ज़ी की भी कोई कदर करो)। शादी व्याह , यूं तो बहुत किस्म के हैं पर हम यहां आज के चलन के अनुसार मैं दो किस्म के विवाह की ही बात करूंगा । १. Love Marriage/ प्रेम विवाह २. Arrange Marriage/ व्यवस्था विवाह युवाओं को तवज्जो देते हुए पहले हम प्रेम विवाह / love marriage की बात करेंगे जिसमें आज कल न प्रेम है और न love । Every love affair is a failure, without exception~ osho मैंने ओशो को quote इसीलिए किया ताकि मैं यह कह सकूं कि मैं उनके इस विचार से सहमत नहीं हूं क्योंकि अब इस विचार पर ...

द्रौपदी

मौन की तपस्या सुन रही, क्यूं द्रौपदी साड़ी से फंदा बुन रही, पायल जो कभी हर्षगीत सुनाती, पांव को पटकती तू अब पाजेब तेरी पीड़ा गाती, पायल जब थिरकती तो कभी रुनझुन रुनझुन होती, बंधन बन बंधती सिसक-सिसक तू रोती, खनकते कंगन जो कलाइयों पर जब पिया हंसते थे और रूठते, पर अब उन्हीं कलाइयों पर खटकते और टूटते, जिस जीवन से जीवन जन्मता उस जीवन को अब जीवन की जरूरत, कभी तो मेहंदी का रंग था अब रक्तरंजित सुहाग मूर्त, ममता करुणा वात्सल्य पर अब क्यूं मौत मंडराती, पुण्य तेज क्षीण हुआ पाप पुण्य पिघलाती, जब स्वयं हर दांव में हार गए हैं पांडव, तो कौन करे रक्षा तुम्हारी? हे माधव !! अब आस तोसे ही अब लाज बचा लो बलिहारी !!

प्रियतम्

अरुणिमा तेज नहीं मुख पर ,  न आँखों के साहिल पर काजल की माया , फिर भी ऐसा क्या है तुझमें प्रियतम जो मेरे मन को भाया ? भायी मुझे तेरे स्नेह तरूवर की अनुहार , वो मधुयुक्त मधुशब्दों की मृदु फुहार , वो चंचल मुस्कान अचंभित , वो शब्दघटा करती मुझको मुदित , कठपुतलियां पुतलियां बनती नैनों की , डूबता था मैं सांझ पर ही ,  दिखलाई छैल छबीली छवि रैनों की , वो व्याकुलता से संदेशों का इन्तज़ार , वो हंसना रूठना तेरा मेरे हृदय के भाव सागर में उठता लहरें अपार , स्वप्न और मृगतृष्णा की यह कैसी पहेली रच डाली , बुझी तो फिर भी मेरे मन ने यह व्यथा कह डाली , क्या तुम नगरी कोई स्वप्नों की ,  कोई मृगतृष्णा या कोई माया... ऐसा क्या है तुझमें प्रियतम जो मेरे मन को भाया  ?

शीर्षक : भारत

शांत हुआ हूं, पर हुआ अब तक मौन नहीं || नव स्वर्णिम अरुणिमा से ले प्रकाश, ढांढस देता स्वयं को, बांधता नव चेतना की आस, प्रखर-शिखर पार कर, नौका को मझधार से तार कर, पहुंचना जीवन रथ, महाभारत की भूमि पर, दोहराना जीवन महाभारत, कुरुक्षेत्र की भूमि पर, आत्ममंथन से ज्ञात हुआ है मुझमें कौन नहीं, शांत हुआ हूं, पर हुआ अब तक मौन नहीं ||१|| बलिदान हो स्थूल सारा स्थल पर, जीतना है स्वयं को महाभारत के बल पर, जीवन रथ चाहे हो डगमग, लड़खड़ाए चाहे प्राण घटक के पग, सारथी बन थामता, जीवन सूत्र हूं जानता, समयधारा को जीवन धरा पे बांध, अडिग कर्तव्य पथ पर, मानो अंगद की जांघ, पर्वत मेरु के समान, दृष्टा अडिग चट्टान, चेतन स्वर की गूंज, आकाश पग नयन स्वप्न से चूम, नवनीत मंथन से ज्ञात हुआ है मुझमें कौन नहीं, शांत हुआ हूं, पर हुआ अब तक मौन नहीं ||२||

शीर्षक: गाऔं हुण गाऔं नी रहे !!

कहाणियां दा घर बूढ़ी अम्मा कन्ने ढई गया, ओ बदामी कज्जल, यादां दे फुहारे संग बही गया.. हुण भी क्या साएं-साएं बगदियाँ कुल्लाँ ? हुण भी क्या मिटियाँ दी जगदियाँ चुल्लाँ ? हुण भी क्या शामी जो, दाणयां दा लगदा भट्ठा ? हुण भी क्या कटोरी सागे दी जो नौंण सजदा ? हुण भी क्या मक्की घराटेयाँ च पिसदी होंगी ? हुण भी क्या रस्सियाँ कुएं जो घिसदी होंगी ? हुण भी क्या गोलगप्पेयाँ च पुदीने दा स्वाद होंगा ? हुण भी क्या कंडेराँ दा घर आवाद होंगा ? हुण भी क्या पहला निबाला गाय जो दिंदे होंगे ? हुण भी क्या मुसाफ़िर टयाले दी छाँव थल्ले सोंदे होंगे ? हुण भी क्या किंब खट्टा-मिट्ठा स्वाद दिंदे होंगे ? हुण भी क्या जबरे खडू नालू बोडियाँ जाई नोंदे होंगे ? हुण भी क्या बुजुर्ग हुक्का खिचदे ? हुण भी क्या तूत गरने बिकदे ? हुण भी क्या चौबरेआं ते ताशाँ दी महफ़िल लगदी ? हुण भी क्या सरौं दे सिंगारें ने धरती फबदी ? हुण भी क्या पीपल दियां ने सजदा ? हुण भी क्या खुशियाँ च ढोल-नगाड़ा बजदा ? हुण भी क्या दुलंणा दी पालकी सजदी ? हुण भी क्या दुलंणा कलिरेयाँ च फबदी ? हुण भी क्या कीचड़े ने ...

मुक्ति बंधन

(श्री कृष्ण-अर्जुन संवाद पर रचित) श्री कृष्ण अर्जुन से: रुकना झुकना तेरा काम नहीं, तू पथिक तुझ से पथ, पथ से तेरा नाम नहीं, हाथों में लिए अभिलाषादीप निरंतर प्रगति करता, डरता न बुराई से बस दामन दमन से तू डरता, चाहे स्वेद की धार बहे, चाहे रक्त की बौछार बहे, मगर पीछे न हट, कर आत्म संकल्प न छोड़ेगा तू यह हठ, जीवन की गगरी में चाहे जीवन हो दो बूंद क्या है ? भीतर तेरे सागर बसता यह दो बूंद दो बूंद क्या है ? तीन पग में माप ले तू सारी धरातल, नीलकंठ भांति पी जा कालकूट से भरा हलाहल, कर्तव्य के गांडीव से जो विपदा बाण चलें हैं, हिमालय की शीतलता, अग्नि के तेज को सहते-सहते सदा वीर चले हैं, नियति ने प्रशस्त किया है मार्ग पर अग्रसर होना है, यही हल था धनंजय यही हल होना है।। अर्जुन श्रीकृष्ण से: आंख में अश्रु, मुख पर मौन लिए खड़ा है अर्जुन, बंध मोह पाश में हार पड़ा है अर्जुन, श्री कृष्ण अर्जुन से : भूल गया तू पौत्र भीष्म का, जिसकी प्रतिज्ञा न जग में दूजी तुझमें गौत्र उस भीष्म का, सामने शकुनि दुर्योधन या हो सूत पुत्र, न हार मान रे पांडु पुत्र, कर्म कर फल से तेरा काम नहीं, र...