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सामाजिक समरसता: भाषण नहीं भंडारा

Disclaimer: जो कोई भी आपसे यह कहता है कि वह आपको किसी समूह में जोड़ कर, किसी पार्टी में जोड़कर या किसी तथाकथित आंदोलन में जोड़कर समाज से आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक भेदभाव को समाप्त कर देगा तो व्यक्ति आपको केवल और केवल अपने हितों को आप के जरिए साध रहा है । समाज में भेदभाव मिटाना और समरसता लाने के लिए किसी भाषण की, किसी नेता की कोई जरूरत नहीं है जरूरत है सिर्फ और सिर्फ भंडारों की और आपकी उसमें सहभागिता की । हाल ही में हमने निर्जला एकादशी का त्यौहार मनाया या जिसे हम बचपन से ही छबील वाला दिन मनाते आ रहे हैं, CORONA संकट की इस घड़ी में सब बन्द था पर यदि नहीं होता तो आपको देखने को मिलती पानी की छबीलें और कुछ जगह पर लंगर और भंडारे भी । पर बतौर समाज हमें इन छबीलों, लंगरों और भंडारों आवश्यकता सिर्फ इसलिए नहीं है क्योंकि इससे केवल किसी भूखे प्यासे का पेट भरेगा। यह छबीलें, लंगर और भंडारे समाजिक संरचना को मजबूत करने और आपस के भेद मिटाने में बहुत सहायक होते हैं। ऐसी मान्यता है यदि आपको अपने परिवार को इक्कठा रखना है तो उन्हें साथ में भोजन करने की आदत डालें और यदि आपको समाज को संगठित करना...

भारत: नशा और अध्यात्म

Disclaimer: मेरा किसी भी प्रकार के नशे से तो वैसे कोई दूर-दूर तक का लेना देना नहीं है और ना ही मैं किसी प्रकार का नशा करता हूं, पर मुझे नशे करने वाले व्यक्तियों से भी किसी तरह की आपत्ति नहीं है जब तक वह मेरी अपनी निजता का हनन न करें । किस्सा:  अभी हाल ही में मुझे एक पहाड़ी क्षेत्र में विचरण करने का मौका मिला। जब मैं अपने मित्र के यहां पहुंचा तो वहां कुछ बुजुर्ग लोग बैठकर हुक्का पी रहे थे। तभी एक बुजुर्ग आदमी ने मुझसे भी पूछा: बेटा हुक्का पियोगे ? मैंने फट से जवाब दिया: मैं नहीं पीता जी। तो फिर बुजुर्ग आदमी ने जवाब देते हुए कहा: पी लो बेटा बीड़ी से अच्छा होता है । मेरे मन में एक विचार शून्य अथवा अंधकार की भांति प्रवाहित हुआ और विचार आया कि मुझे एक लेखक होने नाते इस संदर्भ में कुछ लिखना चाहिए ताकि स्थिति थोड़ी स्पष्ट हो सके इसलिए  यह लेख लिख रहा हूं ताकि एक सामंजस्य स्थापित कर पाऊं नशा करने वालों में और न करने वालों में । आज के सामाजिक परिदृश्य में भारत मुझे एक झूले के भांति अनुभूति देता है, जो झूल रहा है नशा करने वालों और न करन...

विरोध से विद्रोह तक :

यदि आप किसी रास्ते से अकेले गुजर रहे हों और शौचालय की कोई व्यवस्था न हो और आपको पेशाब आ जाये तो आप क्या करोगे पेशाब या स्वच्छ भारत? यह बात हमें समझनी पड़ेगी, आज भारत में विरोध का एक सा ही स्वर सुनता हैं, पुरुष है तो उस पर लाठी, जूते, चप्पल का प्रयोग करो और यदि औरत है तो उसकी रंडी शब्द से ताजपोशी कर दो। क्या हमारी बौद्धिकता केवल यहाँ तक ही सीमित रह गयी है? क्यूँ विरोध विचारिक आधार पर नहीं होता? क्यूँ हम सत्य के लिए विद्रोह नहीं करते? विरोध और विद्रोह हमें शायद एक ही लगें पर दोनों के बीच का अंतर सूर्य-चंद्रमा का है, कहीं न कहीं एक दुसरे के दोनों पूरक हैं, विद्रोह सूर्य की तरह सम्पूर्ण और विरोध चंद्रमा की तरह विद्रोह के सूर्य के बिना अधूरा। दोनों में मूल अंतर केवल इतना ही है कि विरोध सत्य-असत्य को देख कर नहीं किया जाता, वो बस किया जाता है और कभी भी, बिना किसी आधार के भी, परन्तु विद्रोह का आधार हमेशा सत्य हुआ करता है। सत्य, जिसकी तुलना शिव से की गई, जो शिवतत्त्व की तरह अनूठा हो, जो शिव के नेत्र की तरह किसी पर दयाभाव से पड़ जायें तो वरदान, वहीं तीसरा नेत्र ...