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दूध और क़त्लखाने

Disclaimer:  इस लेख का हर धर्म विशेष से लेना देना है, क्योंकि जानवरों की हत्या सब ने मिल कर की है; और जिसने नहीं की, उसकी मृगतृष्णा से, उसे भली भांति परिचित कराया जाएगा। वैसे दिल पर लेने की सख़्त ज़रूरत है, होगा तो कुछ नहीं, जैसा अब तक होता चला आ रहा है; पर क्या पता हृदय परिवर्तन हो जाए; आख़िर सिद्घार्ध भी मृत्यु की ही बात पर बुद्ध हो गए थे। इसी उम्मीद के साथ मैं भी अपना लेख प्रारंभ करता हूं । दूध: हल्दी वाला औषधि, शिलाजीत वाला ताकतवर, केसर वाला गरम, नींबू वाला पनीर, खटास वाला दही और बोर्नविटा वाला रिंकू पिंकू का प्रिय। जय हो दूध, और उसकी महिमा। पर कभी सोचा, यह जो सुबह सुबह वेरका, अमूल, मदर डेयरी, आदि के बूथों पर लाइन पर लग जाते हो; कभी सोचा है कि जितनी सरलता से दूध मिलता है, उतनी ही मुश्किल आन पड़ती है, उन पशुओं के जीवन पर जो हमारी इस दूध की तृष्णा के कारण जन्म लेते हैं। जी हां, मनुष्यों की तरह जानवरों में भी गर्भधारण करने के उपरांत ही दूध आता है। मैं जानता हूं, आपके मन में यह प्रश्न उत्पन्न हो चुका होगा; गर्भधारण करने से तो जीवन की उत्पत्ति होती है, तो मैं काहे मृत्यु...

सामाजिक समरसता: भाषण नहीं भंडारा

Disclaimer: जो कोई भी आपसे यह कहता है कि वह आपको किसी समूह में जोड़ कर, किसी पार्टी में जोड़कर या किसी तथाकथित आंदोलन में जोड़कर समाज से आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक भेदभाव को समाप्त कर देगा तो व्यक्ति आपको केवल और केवल अपने हितों को आप के जरिए साध रहा है । समाज में भेदभाव मिटाना और समरसता लाने के लिए किसी भाषण की, किसी नेता की कोई जरूरत नहीं है जरूरत है सिर्फ और सिर्फ भंडारों की और आपकी उसमें सहभागिता की । हाल ही में हमने निर्जला एकादशी का त्यौहार मनाया या जिसे हम बचपन से ही छबील वाला दिन मनाते आ रहे हैं, CORONA संकट की इस घड़ी में सब बन्द था पर यदि नहीं होता तो आपको देखने को मिलती पानी की छबीलें और कुछ जगह पर लंगर और भंडारे भी । पर बतौर समाज हमें इन छबीलों, लंगरों और भंडारों आवश्यकता सिर्फ इसलिए नहीं है क्योंकि इससे केवल किसी भूखे प्यासे का पेट भरेगा। यह छबीलें, लंगर और भंडारे समाजिक संरचना को मजबूत करने और आपस के भेद मिटाने में बहुत सहायक होते हैं। ऐसी मान्यता है यदि आपको अपने परिवार को इक्कठा रखना है तो उन्हें साथ में भोजन करने की आदत डालें और यदि आपको समाज को संगठित करना...

शीर्षक: गाऔं हुण गाऔं नी रहे !!

कहाणियां दा घर बूढ़ी अम्मा कन्ने ढई गया, ओ बदामी कज्जल, यादां दे फुहारे संग बही गया.. हुण भी क्या साएं-साएं बगदियाँ कुल्लाँ ? हुण भी क्या मिटियाँ दी जगदियाँ चुल्लाँ ? हुण भी क्या शामी जो, दाणयां दा लगदा भट्ठा ? हुण भी क्या कटोरी सागे दी जो नौंण सजदा ? हुण भी क्या मक्की घराटेयाँ च पिसदी होंगी ? हुण भी क्या रस्सियाँ कुएं जो घिसदी होंगी ? हुण भी क्या गोलगप्पेयाँ च पुदीने दा स्वाद होंगा ? हुण भी क्या कंडेराँ दा घर आवाद होंगा ? हुण भी क्या पहला निबाला गाय जो दिंदे होंगे ? हुण भी क्या मुसाफ़िर टयाले दी छाँव थल्ले सोंदे होंगे ? हुण भी क्या किंब खट्टा-मिट्ठा स्वाद दिंदे होंगे ? हुण भी क्या जबरे खडू नालू बोडियाँ जाई नोंदे होंगे ? हुण भी क्या बुजुर्ग हुक्का खिचदे ? हुण भी क्या तूत गरने बिकदे ? हुण भी क्या चौबरेआं ते ताशाँ दी महफ़िल लगदी ? हुण भी क्या सरौं दे सिंगारें ने धरती फबदी ? हुण भी क्या पीपल दियां ने सजदा ? हुण भी क्या खुशियाँ च ढोल-नगाड़ा बजदा ? हुण भी क्या दुलंणा दी पालकी सजदी ? हुण भी क्या दुलंणा कलिरेयाँ च फबदी ? हुण भी क्या कीचड़े ने ...