Skip to main content

Posts

Showing posts with the label beloved

दूध और क़त्लखाने

Disclaimer:  इस लेख का हर धर्म विशेष से लेना देना है, क्योंकि जानवरों की हत्या सब ने मिल कर की है; और जिसने नहीं की, उसकी मृगतृष्णा से, उसे भली भांति परिचित कराया जाएगा। वैसे दिल पर लेने की सख़्त ज़रूरत है, होगा तो कुछ नहीं, जैसा अब तक होता चला आ रहा है; पर क्या पता हृदय परिवर्तन हो जाए; आख़िर सिद्घार्ध भी मृत्यु की ही बात पर बुद्ध हो गए थे। इसी उम्मीद के साथ मैं भी अपना लेख प्रारंभ करता हूं । दूध: हल्दी वाला औषधि, शिलाजीत वाला ताकतवर, केसर वाला गरम, नींबू वाला पनीर, खटास वाला दही और बोर्नविटा वाला रिंकू पिंकू का प्रिय। जय हो दूध, और उसकी महिमा। पर कभी सोचा, यह जो सुबह सुबह वेरका, अमूल, मदर डेयरी, आदि के बूथों पर लाइन पर लग जाते हो; कभी सोचा है कि जितनी सरलता से दूध मिलता है, उतनी ही मुश्किल आन पड़ती है, उन पशुओं के जीवन पर जो हमारी इस दूध की तृष्णा के कारण जन्म लेते हैं। जी हां, मनुष्यों की तरह जानवरों में भी गर्भधारण करने के उपरांत ही दूध आता है। मैं जानता हूं, आपके मन में यह प्रश्न उत्पन्न हो चुका होगा; गर्भधारण करने से तो जीवन की उत्पत्ति होती है, तो मैं काहे मृत्यु...

प्रियतम्

अरुणिमा तेज नहीं मुख पर ,  न आँखों के साहिल पर काजल की माया , फिर भी ऐसा क्या है तुझमें प्रियतम जो मेरे मन को भाया ? भायी मुझे तेरे स्नेह तरूवर की अनुहार , वो मधुयुक्त मधुशब्दों की मृदु फुहार , वो चंचल मुस्कान अचंभित , वो शब्दघटा करती मुझको मुदित , कठपुतलियां पुतलियां बनती नैनों की , डूबता था मैं सांझ पर ही ,  दिखलाई छैल छबीली छवि रैनों की , वो व्याकुलता से संदेशों का इन्तज़ार , वो हंसना रूठना तेरा मेरे हृदय के भाव सागर में उठता लहरें अपार , स्वप्न और मृगतृष्णा की यह कैसी पहेली रच डाली , बुझी तो फिर भी मेरे मन ने यह व्यथा कह डाली , क्या तुम नगरी कोई स्वप्नों की ,  कोई मृगतृष्णा या कोई माया... ऐसा क्या है तुझमें प्रियतम जो मेरे मन को भाया  ?